जब उत्तराखंड राज्य बनने की प्रक्रिया चल रही थी तब उधम सिंह नगर और हरिद्वार जनपद के लोग इन जनपदों को उत्तराखंड में शामिल करना का विरोध कर रहे थे/इस कारण उन्होंने लम्बा आन्दोलन भी किया /विरोध करने वालो का तर्क था कि इस राज्य में उनके हित सुरक्षित नहीं रहेंगे पर दोनों जनपदों को उत्तराखंड में शामिल किया गया /क्यों शामिल किया गया इसके पीछे भी तमाम तर्क दिए गए /पर उत्तराखंड का हिस्सा बनने के बाद दोनों जनपद राज्य के विकास में अपनी अहम् भूमिका निभा रहे है पर इसके बाबजूद कुछ लोग इन दोनों जनपदों की तरक्की से नाखुश है और वह समय समय पर पहाड़ और मैदान की बात करके अपनी राजनैतिक रोटिया सेकने में लगे रहते है /
रोजगार और विकास उत्तराखंड की आज भी सबसे ज्वलंत समस्या है /दीगर है कि राज्य की नीव भी इन्ही समस्याओ पर ही रखी गयी थी/कांग्रेस कि तिवारी सरकार के कार्यकाल के दौरान हरिद्वार और उधम सिंह नगर जनपद में सिडकुल कि स्थापना हुयी, नतीजन राज्य के बेरोजगारों को बड़ी संख्या में रोजगार पाने का अवसर मिला /हां यह भी सच है कि सिडकुल में उत्तर परदेश के लोग भी काफी संख्या में रोजगार पा गए /बाहरी राज्य के लोगो को रोगजार क्यों मिला , हो सकता है कि कुछ लोगो को इस पर भी एतराज हो ,तो उन्हें जानना चाहिए कि स्थानीय लोगो को ही इन उधोगो में रोजगार मिले यह सुनिश्चित करना प्रदेश सरकार का काम है /उधोग तो भारी रियायतों के लालच में मुनाफा कमाने यहाँ आये है /
पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने समूह ग कि नोकरियो में राज्य कि तीन बोलियों कुमायनी,गढ़वाली और ज़ोनसारी की अनिवार्यता कर दी थी /जब इस फैसले का विरोध हुआ तो भाजपा सरकार बोली के अनिवार्यता के अपने इस निर्णय से पीछे हट गयी/हालाँकि सरकार का पहला फैसला राजनीतिक रूप से बिलकुल अनेतिक था क्योकि सरकार ने समूह ग कि नोकरियो में जिन तीन बोलियों कि अनिवार्यता कि थी, वो बोली उधम सिंह नगर और हरिद्वार के लोगो को नहीं आती .ऐसी हालत में यदि यह नियम लागू रहता तो इन दोनों जनपदों के युवा समूह ग कि नोकरियो से वंचित रह जाते फलस्वरूप एक बार फिर उनके मन में यह सवाल आता कि इस राज्य में उसके हित सुरक्षित नहीं है /फिर कही न कही उनके मन में पहाड़ बनाम मैदान जैसी संकुचित सोच धर जाती जो राज्य हित मे नहीं होती/हालाँकि प्रदेश सरकार को समय रहते अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने अपना फैसला बदल दिया/
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर निशंक सरकार ने यह गलत फैसला क्यों ले लिया/सम्भवता सरकार कि नजर २०१२ के विधान सभा चुनाव पर है/पर इसके खिलाफ खुद भाजपा में भी ऐसी खिलाफत होगी यह सरकार को उम्मीद नहीं थी /सरकार यह फैसला लेते समय भूल क्यों गयी कि इस फैसले के बाद उसकी पार्टी और राज ठाकरे कि पार्टी में क्या फर्क रह जायेगा/ठाकरे भी तो यही चाहते है कि महाराष्ट्र में रहने वाला हर आदमी मराठी भाषा समझे और जाने ,फिर भाजपा महाराष्ट्र में ठाकरे के इस कदम का विरोध क्यों करती है ?अगर उत्तराखंड में कुमायनी .गढ़वाली और ज़ोनसारी बोली जानने वाले ही नोकरी का हक रखते है तो इन दोनों जनपदों को उत्तराखंड में रखने कि क्या जरुरत है /अगर यह फैसला लागू हो जाता और उत्तर प्रदेश में भी स्थानीय लोगो को नोकरी मिलती तो इस जनपद के युवाओ के भविष्य का क्या होता?उनकी हालत तो धोबी के कुत्ते जसी होती जो ना घर का होता और ना ही बाहर का .वह भी तब जबकि सबसे ज्यादा उपज ,राजस्व और रोजगार यह दोनों जनपद प्रदेश में सबसे अधिक देते है /
प्रदेश सरकार ने अपना फैसला क्या बदला कि पहाड़ और मैदान के नाम पर जहरीली राजनीती करने वालो के पेट में दर्द शुरू हो गया /जब राज्य बन रहा था तब यह लोग क्यों नहीं बोले थे कि इन तीनो बोलियों को जानने वाले जनपदों को ही उत्तराखंड में शामिल किया जाये /तब क्यों इनकी जबान पर ताले लगे रहे/आज यह कुतर्क देते है कि उत्तराखंड में रहने वालो को स्थानीय बोलियो कि जानकारी होनी चाहिए /जबकि पुरे पहाड़ में हिंदी बोली सदियो से ना सिर्फ बोली बल्कि समझी भी जाती है /यहाँ यह भी गोरतलब है कि उधम सिंह नगर में पंजाबी समुदाय खासी तादात में है /कल वो भी मांग करेंगे कि समूह ग कि नोकरियो में पंजाबी भाषा अनिवार्य कि जाये तो क्या होगा /जो राज्य विकास कि दिशा में बढ़ना चाहिए .वो राज्य बोली ,भाषा ,इलाकेवाद कि लडाई में उलझ जायेगा /इसलिए कुछ पत्रकारों से अनुरोध है कि वो पहाड़ और मैदान कि सोच से ऊपर उठ कर राज्य के विकास की सोच बनाओ /अगर उत्तराखंड में आन्दोलन की जरुरत भी है तो इसलिए नहीं की इन बोलियो को जानने वालो को ही नोकरी मिले बल्कि इस लिए की यहाँ के लोगो के लिए सरकार रोजगार के साधन उपलब्ध कराये
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